मासूम पुकार

तेरी ही तो अंश माँ मैं, तू जननी है मेरी
फिर मेरा अस्तित्व मिटाना, ये कैसी खुशी है तेरी|
क्यूँ न चाहती इस जग में लाना, क्या गलती है मेरी
मैं हूँ तेरी आत्मजा, क्या यही चूभन है तेरी|

कम क्यूँ आंके हम बेटी को, ये कैसी सोच है तेरी
कंधे से कन्धा मिलाते, जाने दुनिया सारी|
हर पल आगे बढ़ बढ़ कर हम, निभाते जिम्मेदारी
ऐसा ना होगा सपना तेरा, जो हम न कर सके पूरी|

तो उखाड़ फेक इस छोटी सोच को, जगाओ ममता तुम्हारी
धरती पर ले आओ मुझको, प्यारी माता मेरी|
मना खुशियां मेरी भी जन्म पर, मैं हूँ तेरी दुलारी
मिटा दे जग से ये अन्धयारी, है मासूम पुकार हमारी|

नोटों के रिश्ते

दहेज़ प्रथा हमारे देश की ऐसी सामाजिक कुरीति है जो शिक्षा के साथ घटने की बजाय और बढ़ती ही जा रही है| संभवतः इसका एक कारण यह भी हो सकता है की आजकल शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का जरिया मात्र रह गयी है और लोग किताबों में पढ़े नैतिक ज्ञान को अपनी जिंदगी में लागु नहीं कर रहे हैं | तभी तो इंजीनियर, डॉक्टर, बैंक मेनेजर और यहाँ तक की शिक्षक भी दहेज़ के उत्प्रेरक बने बैठे हैं| दहेज़ के अलग अलग आयाम बनाये गए हैं-अगर बड़ी नौकरी है तो ज्यादा दहेज़, थोड़ी छोटी है तो कम, सरकारी है तो ज्यादा, प्राइवेट है तो थोड़ी कम और वगैरह वगैरह | अर्थात यह कितना नाटकीय है की ये उच्च शिक्षा वाले लोग ही दहेज़ प्रथा को आगे बढ़ा रहे हैं | ऐसे में बेटियों की शादी अच्छे घरों में कराने के लिए दहेज़ जुटाने में पिता के तलवे घिस रहे हैं , वे इसके लिए कर्ज लेकर भी पैसे इकठ्ठा कर रहे हैं | बहुत सी बेटियां अभी भी दहेज़ की इस कुप्रथा के कारण आत्महत्या कर रही हैं | दहेज़ सिर्फ शादी से पहले की रकम नही उसके बाद भी लिया जाता है और न दे पाने पर मासूम बहुओं के साथ अत्याचार किया जाता है, मार -पिट की जाती है और बहुत सारी जगहों में अभी 21वीं सदी में भी जिन्दा जला दिया जाता है | आज के इस समय में ये ये रिश्ते सिर्फ नोटों के रिश्ते मात्र बन गए है, लोग गुणों से ज्यादा पैसे को महत्व दे रहे हैं और इसका सीधा प्रभाव हमारे समाज पर पड़ रहा हैं| रिश्तों की गहराईयां कम हो रही हैं, नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है और ये दहेज़ प्रथा अपने साथ साथ और भी कई सामाजिक कुरीतियों की जननी बन गई है जैसे भ्रूण हत्या, घरेलु हिंसा इत्यादि|

ऐसे में प्रश्न ये उठता है की आखिर इतनी शिक्षा के बावजूद ये कुप्रथा क्यूँ चल रही है? क्यूँ लोग अपनी ही सुख शांति भंग कर रहे हैं? आखिर वो कौन से वर्ग के लोग हैं जो इससे लाभान्वित हो रहे हैं? क्या लालच ने नैतिकता पर जीत हासिल कर ली है?                                                                                                                                                                    इन सभी प्रश्नों का एक ही जवाब है -समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास | हमारी सोच में पैसे की गर्त बैठ गई है| लोग भावनाओं से ज्यादा पैसे को महत्व दे रहे हैं|समाज के किसी भी वर्ग के लोग हो वे इससे लाभान्वित नही हो रहे हैं – बेटों के समय में दहेज़ लेने में उन्हें आनंद आता हैं और वही लोग दहेज़ के खिलाफ हो जाते हैं जब बेटियों की शादी की बारी आती हैं| अगर एक उदहारण के तौर पर ये मान लिया जाये की एक इंजीनियर ने दहेज़ में 20 लाख रूपये लिए तो क्या इन 20 लाख रुपयों से वह बहुत अमीर हो जाएगा ? इसके जगह पर अगर एक अच्छी हमसफ़र मिले तो वो सही मायनो में अमीर होगा |वाद-विवाद में जो लोग दहेज़ के खिलाफ होते हैं वो भी असल जिंदगी में इस कुप्रथा का साथ देते हैं| इसका बस एक ही निष्कर्ष निकलता हैं की दोष सिर्फ हमारी सोच का है | हम अपने सोच में समानता नही रख रहे हैं | इस कुप्रथा के लिए हम सभी जिम्मेदार हैं क्योंकि हम इसे कुप्रथा मानते हुए भी इसका समर्थन कर रहे है| हमें अपनी सोच की इस भिन्नता को मिटाना होगा, अपने लिए हम जैसा सोचते है, दूसरों के लिए भी सोचना होगा | हमें अपनी सोच बदलनी होगी | हमें अपने नैतिक मूल्यों को वापस जगाना होगा | इसके लिए आईये हम युवा वर्ग पहल करते है एक सुन्दर भारत के निर्माण की, जहाँ इन कुरीतियों की कोई जगह न हो और तनावरहित प्रसन्न समाज का निर्माण हो | ये नोटों के रिश्ते ख़त्म होंगे तभी सही मायने में हमारा भारतवर्ष महान बनेगा|

My First Motivational Poem-स्वतंत्र पंछी

 जब खुले ये पंख मेरे , सोचा कहाँ बंधे थे ये
मन का भ्रम था घर किये , वरना कु न उड़े थे ये
न थी बेड़ी न बंदिश , सोचो कितने हरे थे ये
बादल छटने की आस में , कैसे बेजान पड़े थे येbird

बादल छटा बाहर आयी , अब उड़ने को थे तैयार ये
भरी जब पहली उड़ान, तो पीछे न मुड़े थे ये
उड़े जब बादलों से भी ऊँचे , तो सोचा कहा खड़े थे ये
भ्रम की बेड़ियों से थे बंधे , वरना स्वतंत्र पड़े थे ये

तो मैं स्वतंत्र पंछी , देती तुम्हे सलाह ये
न डर कभी न झुक कभी , सब वाश में है तू जान ये
बढ़ता चल अपनी राह पर , छलावा है तूफ़ान ये
तो खोल पंख और ले उड़ान, सब तुझसे ही है मान ये